Cheque Bounce Case: चेक बाउंस पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जहा का खाता वही होगी शिकायत…

Cheque Bounce Case: चेक बाउंस पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जहा का खाता वही होगी शिकायत…

Cheque Bounce Case: सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है, जिससे देशभर में ऐसे मामलों की सुनवाई के क्षेत्राधिकार को लेकर स्पष्टता आ गई है। कोर्ट ने कहा है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत शिकायत उसी न्यायालय में दायर की जा सकती है जहां प्राप्तकर्ता (payee) का बैंक खाता है, न कि उस स्थान पर जहां चेक को वसूलने के लिए प्रस्तुत किया गया हो।

Cheque Bounce के कौन-से मामले में आया फैसला?

यह फैसला प्रकाश चिमनलाल सेठ बनाम जागृति कीयूर राजपोपट मामले में आया, जिसमें जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट और मैंगलोर के मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया।

Cheque Bounce Case: चेक बाउंस पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जहा का खाता वही होगी शिकायत…
Cheque Bounce Case: चेक बाउंस पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जहा का खाता वही होगी शिकायत…

क्या था Cheque Bounce Case?

प्रकाश सेठ ने आरोप लगाया कि कीयूर राजपोपट ने ₹38.5 लाख का ऋण लिया था। जागृति (कीयूर की पत्नी) ने ऋण की गारंटी दी और चार चेक जारी किए। ये चेक मुंबई की कोटक महिंद्रा बैंक शाखा में जमा किए गए लेकिन बाउंस हो गए। शिकायतें मैंगलोर की अदालत में दर्ज की गईं, लेकिन मजिस्ट्रेट ने क्षेत्राधिकार न होने का हवाला देकर उन्हें खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने भी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता का खाता मैंगलोर की बेंदूरवेल शाखा में था और मुंबई शाखा में चेक केवल जमा करने के लिए प्रस्तुत किए गए थे। इसलिए मैंगलोर की अदालत को क्षेत्राधिकार प्राप्त है।

कोर्ट ने धारा 142(2)(a) का हवाला देते हुए कहा: “जब चेक किसी खाते के माध्यम से वसूली के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो उस अदालत को क्षेत्राधिकार प्राप्त होता है जहां प्राप्तकर्ता का बैंक खाता स्थित है।” इस संदर्भ में कोर्ट ने ब्रिजस्टोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम इंदरपाल सिंह (2016) का भी उल्लेख किया।

Cheque Bounce Case का क्या होगा असर?

इस फैसले से अब चेक बाउंस मामलों में शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया में स्पष्टता आएगी। इससे अनावश्यक क्षेत्राधिकार विवादों से बचा जा सकेगा और न्याय प्रक्रिया तेज होगी।

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